भाग रहा था मन
जाने कब से
क्या पाना था ?
क्या थी होड़ ?
क्या चाहत थी ?
क्यों थी दौड़?

ख्वाबों उम्मीदों
में जकड़े
जीत जोश का
दामन पकड़े
अति उत्साहित
अति आशंकित
अंजाने डर मे
प्रतिपल भटके

निकल गये
इतने आगे
छोड़ा खुद को
भी पीछे
इक कशमकश
इक खींचतान
कभी आगे
कभी पीछे

सहसा हुआ
यह क्या आभास
छूटा भागदौड़
का भाव
अब मन चाहे
इक ठहराव
बस मन चाहे
एक ठहराव

सन्यासी………✍️

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By Sanyasi

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